परिचय

1 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले में जन्मे राजगोपाल सिंह उन चंद शाइरों में से एक हैं जिन्होंने ग़ज़ल की दुनिया में अपने अलग रंग से अपनी अलग पहचान क़ायम की है।

 

 

प्रकृति चित्रण और भारतीय संस्कृति की ख़ुशबू आपकी ग़ज़लों को अपने समय की तमाम अन्य ग़ज़लियात से अलग करती है। पारिवारिक संबंधों और ग़ुम होती संवेदना को जिस ख़ूबसूरती से आपने अपनी रचनाओं में उकेरा है वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। आपके दोहे और गीत श्रोताओं को मंत्रमुग्ध तो करते ही हैं, साथ ही साथ उनकी स्मृतियों में आपका तरन्नुम लम्बे समय तक ताज़ा बना रहता है। तुलसी, नीम, बरगद, सूरजमुखी और पीपल जैसे रदीफ़ों पर ग़ज़ल कहने वाला ये शाइर अपनी निजी ज़िन्दगी में भी बाग़वानी और प्रकृति का इस क़द्र दीवाना था कि साठ वर्ष से अधिक की उम्र में भी बरसात के दिनों में खुरपा उठाए गमलों की गुड़ाई करते दिखाई देता था।
‘ज़र्द पत्तों का सफ़र’; ‘बरगद ने सब देखा है’; ख़ुशबुओं की यात्रा’ और ‘चौमास’ शीर्षक से आपके चार काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इसके अतिरिक्त ‘परवाज़’ और ‘चंद पल तेरी बाँहों में…’ शीर्षक से आपकी दो ऑडियो सी डी भी श्रोताओं के लिए उपलब्ध हैं।

 

राजगोपाल सिंह की ग़ज़लियात और दोहे जितने सहज हैं उतना ही उनका व्यवहार भी सरल और सादा था। दिल्ली जैसे महानगर में भी शांति की तलाश करते हुए एक कोने में नजफगढ़ में घर बनाकर इस समय आप ख़ुद की तलाश करते रहे। आई बी से सेवानिवृत्त होने के बाद वे जीवन के अंतिम समय तक पूर्णरूपेण काव्य साधना में संलग्न रहे।

 

6 अप्रैल 2014 को देह में बढ़ी मिठास (डायबिटीज़) ने आपकी मीठी आवाज़ को हमेशा-हमेशा के लिये ख़ामोश कर दिया। …अब कोई गुड़ाई नहीं करता गमलों में लगे बरगद, पीपल और फ़ाइकस की। अब कोई घंटों नहीं निहारता नजफ़गढ़ के उस मकान की मुंडेरों पर रखे गमलों के कैक्टस को…। अब कोई नहीं सहेजता उन पुर्ज़ों को जिन पर एक मिसरा लिख कर उस सृजन के सुख में घंटों डूबे रहते थे राजगोपाल जी।

 

दीवार पर टँगी एक तस्वीर टकटकी लगाये देखती रहती है उन किताबों को जो कुल जमा पूंजी थी हरियाली से बतियाते एक संज़ीदा शायर की।