आँखों के सपनों का सफ़र

ज़िन्दगी की जागती आँखों के सपनों का सफ़र
झील में ज्यों झिलमिलाते चांद-तारों का सफ़र

उम्र भर रोशन किए अश्क़ों से लफ्ज़ों के चराग़
इस तरह से तय किया है हमने गीतों का सफ़र

शहर से जब भी हम अपने गाँव लौटे यूँ लगा
करके तय आए हों घर जैसे कि सदियों का सफ़र

शाख़ से टूटे तो आंधी साथ अपने ले उड़ी
ख़त्म हो जाने कहाँ इन ज़र्द पत्तों का सफ़र

एक पल नज़रें उठीं, आँखें मिलीं, फिर झुक गईं
लौट आए कर के हम जैसे कि जन्मों का सफ़र

कब का भूला पल आँखों में उभरा है

कब का भूला पल आँखों में उभरा है
यादों का बादल आँखों में उभरा है

पाँव पसारे हैं जब भी सन्नाटे ने
भारी कोलाहल आँखों में उभरा है

पत्थर ही पत्थर पलकों से टकराए
जब-जब शीशमहल आँखों में उभरा है

जब भी सूरज ने आँखें दिखलाई हैं
आँगन का पीपल आँखों में उभरा है

जिसने आँसू पोंछे मेरा मुख चूमा
वो मैला आँचल आँखों में उभरा है

कुछ तो अपने और मेरे दरमियाँ रहने भी दे

कुछ तो अपने और मेरे दरमियाँ रहने भी दे
दूरियाँ चुभती हैं फिर भी दूरियाँ रहने भी दे

ख़्वाब है तो टूट भी जाएगा थोड़ी देर में
तू मेरी पलकों पे अपनी उंगलियाँ रहने भी दे

मैं मुक़म्मल हो गया तो देवता बन जाऊंगा
मुझमें हैं जो ख़मियाँ वो ख़मियाँ रहने भी दे

इनसे मत उम्मीद रख ये रोशनी देंगे तुझे
झील में तारों की हैं परछाइयाँ रहने भी दे

फेंक मत इनको कि जब अपनों से मन भर जाएगा
हौसला देंगी तुझे ये चिट्ठियाँ रहने भी दे

घुघती टेर लगाती रहियो

कौन जाने कब किस पगडंडी पे
दीखे मोरा सिपहिया
घुघती टेर लगाती रहियो

धौल गंग तू ही मेरी सखी है सहेली
साथ-साथ दौड़ी मेरे संग-संग खेली
तेरा गात छू के मैंने वचन दिए थे
पाप किए थे या पुण्य किए थे
कौन जाने कब साँस-डोर छूट जाए
डोर छूट जाए मो सों भाग्य रूठ जाए
कि बहना धीर बंधाती रहियो
घुघती टेर लगाती रहियो

अबके बरस बड़ी बरफ़ पड़ी है
जैसे सारी घाटी चांदी से मँढ़ी है
हिम से घिरी हैं ये शैल-शिलाएँ
जले हैं निगोड़ी और मुझे भी जलाएँ
अंग-अंग जैसे जंग छिड़ी है
पर्वत की नदिया जैसी देह चढ़ी है
घटाओ हिम बरसाती रहियो
घुघती टेर लगाती रहियो

चांदनी रातों में अक्सर बोलते हैं

चांदनी रातों में अक्सर बोलते हैं
ख़ुशनुमा ख़ामोश मंज़र बोलते हैं

बोलते हैं, जब भी रहबर बोलते हैं
फूल से लहजे में पत्थर बोलते हैं

मैं बहुत ख़ामोश होता हूँ तो मुझसे
घर के सन्नाटे लिपटकर बोलते हैं

जब ज़बां पर कैंचियाँ लटकी हुई हों
धार पा जाते हैं अक्षर बोलते हैं

पत्थरों में प्राण भरते हैं जो अक्सर
ऐसे लोगों को सुख़नवर बोलते हैं

कभी सपने, कभी आँसू, कभी काजल की तरह

कभी सपने, कभी आँसू, कभी काजल की तरह
चश्म-दर-चश्म भटकता फिरा बादल की तरह

ज़िन्दगी मेरी मरुस्थल है, हर इक बूंद मुझे
रोज़ दौड़ाती रही है किसी पागल की तरह

ऐसा लगता है कहीं पास बहुत पास है तू
सरसराती है हवा जब तेरे आँचल की तरह

चन्द रोज़ा हैं ये ख़ुशियाँ, तू इन्हें क़ैद न कर
मुट्ठियों से ये फिसल जाएंगी मख़मल की तरह

धूप दुश्मन के भी हिस्से की उठा लेगा अगर
लोग पूजेंगे तुझे गाँव के पीपल की तरह

चुप की बाँह मरोड़े कौन

चुप की बाँह मरोड़े कौन
सन्नाटे को तोड़े कौन

माना रेत में जल भी है
रेत की देह निचोड़े कौन

सागर सब हो जाएँ मगर
साथ नदी के दौड़े कौन

मुझको अपना बतलाकर
ग़म से रिश्ता जोड़े कौन

भ्रम हैं, ख़्वाब सलोने पर
नींद से नाता तोड़े कौन

कभी तिनके, कभी पत्ते, कभी ख़ुश्बू उड़ा लाई

कभी तिनके, कभी पत्ते, कभी ख़ुश्बू उड़ा लाई
हमारे घर तो आंधी भी कभी तनहा नहीं आई

लचकती डाल को ही सबने लचकाया है इस जग में
सबब टहनी के झुकने का ये दुनिया कब समझ पाई

मेरा उनसे बिछुड़ना और मिलना ख़्वाब था जैसे
लिपट कर रोई है, ताउम्र मुझसे मेरी तनहाई

अजब फ़नकार है, गढ़ता है शक्लें सैकड़ों हर दिन
मगर सूरत कभी कोई किसी से कब है टकराई

किसी के मानने, ना मानने से कुछ नहीं होता
उसी का नूर है सब में, उसी की सब में रानाई

हमसे करते रहे दिल्लगी रात भर

हमसे करते रहे दिल्लगी रात भर
नींद भी, ख़्वाब भी, आप भी रात भर

रात भर बादलों ने उड़ाई हँसी
छटपटाती रही इक नदी रात भर

ऐसा लगता है मौसम का रुख़ देखकर
बर्फ़ शायद कहीं पर गिरी रात भर

फूल बनते ही कल जो बिखर जाएगी
याद आती रही वो कली रात भर

चांदनी पर ही सबने कहे शे’र क्यों
सोचती ही रही तीरगी रात भर

बेख़बर सूरजमुखी

बाग़ के वातावरण से बेख़बर सूरजमुखी
जिस तरफ़ सूरज चले देखे उधर सूरजमुखी

भोर की पहली किरण कुछ कह गई है कान में
लाज के मारे हुई है गुलमुहर सूरजमुखी

ओस के क़तरे हैं मानो मांग में मोती सजे
लग रही है ख़ूबसूरत किस क़दर सूरजमुखी

देह सारी आँसुओं से भीगकर तर हो गई
याद में रोई है किसकी रात भर सूरजमुखी

प्रीत सूरज से मगर अर्पित हुई पाषाण पर
हो गई काग़ज़ सरीखी सूखकर सूरजमुखी