पुरसोज़ आवाज और दिलकश तरन्नुम — दीक्षित दनकौरी

मैं सर्वश्रेष्ठ ,मैं उस्ताद, मैं नम्बर वन वाले इस दौर में राज गोपाल सिंह जैसे सहज, विनम्र और सीधे सादे कवि/शायर कम-कम ही मिलते है। अपने गीतों,ग़ज़लों और दोहों में पारिवारिक स्पंदनों, सामाजिक सरोकारों औरप्रकृति की भिन्न भिन्न छटाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने वाले भाई राजगोपाल सिंह अपनी पुरसोज़ आवाज और दिलकश तरन्नुम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखते थे। पिछले लगभग 30 वर्षों में उनके साथ अनेक बार काव्य -पाठ का मुझे शरफ हासिल है।

 

उनके साथ अनेक यात्राएं भी मैंने कीं। सबसे बड़ा गुण मैंने उनमें देखा कि मैंने उन्हें कभी भी किसी की भी आलोचना करते नहीं देखा, किसी विवाद में पड़ते नहीं देखा। किसी भी अरुचिकर प्रसंग में उनकी फ़क़ीराना मुस्कराहट सारे माहौल को ताज़ा दम कर देती थी। उनकी शेष स्मृति को नमन। काश …

 

-दीक्षित दनकौरी