जब भी वो बाहर जाता है

जब भी वो बाहर जाता है
चेहरा घर पर धर जाता है

 

रोज़ सवेरे जी उठता है
रोज़ शाम को मर जाता है

 

हक़ की ख़ातिर लड़ने वाला
नाहक़ में ही मर जाता है

 

जाने क्या देखा है उसने
आहट से ही डर जाता है